मंगलवार, 22 सितंबर 2009

अपने दिल को पत्थर का बना कर रखना,
हर चोट के निशान को सजा कर रखना

उड़ना हवा में खुल कर लेकिन,
अपने कदमों को ज़मी से मिला कर रखना

छाव में माना सुकून मिलता है बहुत,
फिर भी धूप में खुद को जला कर रखना

उम्रभर साथ तो रिश्ते नहीं रहते हैं,
यादों में हर किसी को जिन्दा रखना

वक्त के साथ चलते-चलते , खो ना जाना,
खुद को दुनिया से छिपा कर रखना

रातभर जाग कर रोना चाहो जो कभी,
अपने चेहरे को दोस्तों से छिपा कर रखना

तुफानो को कब तक रोक सकोगे तुम,
कश्ती और मांझी का याद पता रखना

हर कहीं जिन्दगी एक सी ही होती हैं,
अपने ज़ख्मों को अपनो को बता कर रखना

मन्दिरो में ही मिलते हो भगवान जरुरी नहीं,
हर किसी से रिश्ता बना कर रखना

मरना जीना बस में कहाँ है अपने,
हर पल में जिन्दगी का लुफ्त उठाये रखना

दर्द कभी आखरी नहीं होता,
अपनी आँखों में अश्को को बचा कर रखना

सूरज तो रोज ही आता है मगर,
अपने दिलो में ' दीप ' को जला

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें