सोमवार, 21 सितंबर 2009

aaj ki baat

ये कौन सी जमीं है ये कौन सा आसमां
कि हर तरफ है शोरगुल का ही समांसहमा बचपन,
भटका युवा मन नशे की देवी को करता भविष्य अर्पण
अंधी दौड़ में पगलाया, सुलगता जीवनलुटती आबरु,
बहता लहूजलता आशियाना,
वादों का सड़ता खजाना
भूख से व्याकुल सुबह यहां की ठंड से कांपती शाम है।
।।दिलों में उफनती नफरत,
आंखों में तैरता डरघुट घुट कर जीवन वृक्ष रहा है
मरगांव में सूखा पड़ा है कुंआ
किसे है परवाह कि यहां तो जिस्मों से उठ रहा है धुंआ
खून से सने चेहरों पर नाचती वो बेशर्म हंसी
परिचितों में भी महसूस होती अपनों की कमी
टनम पलकों से टपकटी रात गहराती चली जाती है
भरी महफिल में मनहूस तन्हाई काटने चली आती
है कौन सी जमीं है ये कौन सा आसमां
अफसोस क्या यही है मेरा भारत महान
KUNVAR SAMEER SAHI

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