दरोगा साहब की कारस्तानी तो देखिये
फैजाबाद पुलिस की सजगता को प्रदर्शित करती एक खबर २८ सितम्बर को उपरोक्त शीर्षक से छपी जिसे पढ़कर बड़ी कोफ्त हुई की आखिर उस देश का क्या होगा जिसके रक्षक प्रहरी इतने लापरवाह होगे ..की उनके तकिये के नीचे से चोर उनकी सर्विस रिवाल्वर व तीन मोबाइल भी उठा ले गए .इन सारे सामानों के गायब होने की खबर अमृत लाल नामक दरोगा को सुबह पता चली आनन फानन में खबर जंगल में आग के तरह फैली पुलिस महकमे के आला अधिकारी एस एस पी ने जाँच सीओ स्तर के अधिकारी को दे दिया इतना ही नहीं दरोगा ने अज्ञात लोगो के खिलाफ थाना पुराकलंदर में अपराध नम्बर ८३७ /०९ धारा ३८० के तहत मामला भी दर्ज करा दिया ..यह तो रही घटना ...अब इस घटना की जानकारी होने के बाद आम जनता इन निकम्मे पुलिस वालो पर कैसे भरोषा करे नये पुलिस महानिदेशक कर्मबीर सिंह जी अपने इन लापरवाह पुलिस वालो को कैसे सुधारेगे..अरे कुछ करिए साहब ....
सोमवार, 28 सितंबर 2009
मंगलवार, 22 सितंबर 2009
अपने दिल को पत्थर का बना कर रखना,
हर चोट के निशान को सजा कर रखना
उड़ना हवा में खुल कर लेकिन,
अपने कदमों को ज़मी से मिला कर रखना
छाव में माना सुकून मिलता है बहुत,
फिर भी धूप में खुद को जला कर रखना
उम्रभर साथ तो रिश्ते नहीं रहते हैं,
यादों में हर किसी को जिन्दा रखना
वक्त के साथ चलते-चलते , खो ना जाना,
खुद को दुनिया से छिपा कर रखना
रातभर जाग कर रोना चाहो जो कभी,
अपने चेहरे को दोस्तों से छिपा कर रखना
तुफानो को कब तक रोक सकोगे तुम,
कश्ती और मांझी का याद पता रखना
हर कहीं जिन्दगी एक सी ही होती हैं,
अपने ज़ख्मों को अपनो को बता कर रखना
मन्दिरो में ही मिलते हो भगवान जरुरी नहीं,
हर किसी से रिश्ता बना कर रखना
मरना जीना बस में कहाँ है अपने,
हर पल में जिन्दगी का लुफ्त उठाये रखना
दर्द कभी आखरी नहीं होता,
अपनी आँखों में अश्को को बचा कर रखना
सूरज तो रोज ही आता है मगर,
अपने दिलो में ' दीप ' को जला
हर चोट के निशान को सजा कर रखना
उड़ना हवा में खुल कर लेकिन,
अपने कदमों को ज़मी से मिला कर रखना
छाव में माना सुकून मिलता है बहुत,
फिर भी धूप में खुद को जला कर रखना
उम्रभर साथ तो रिश्ते नहीं रहते हैं,
यादों में हर किसी को जिन्दा रखना
वक्त के साथ चलते-चलते , खो ना जाना,
खुद को दुनिया से छिपा कर रखना
रातभर जाग कर रोना चाहो जो कभी,
अपने चेहरे को दोस्तों से छिपा कर रखना
तुफानो को कब तक रोक सकोगे तुम,
कश्ती और मांझी का याद पता रखना
हर कहीं जिन्दगी एक सी ही होती हैं,
अपने ज़ख्मों को अपनो को बता कर रखना
मन्दिरो में ही मिलते हो भगवान जरुरी नहीं,
हर किसी से रिश्ता बना कर रखना
मरना जीना बस में कहाँ है अपने,
हर पल में जिन्दगी का लुफ्त उठाये रखना
दर्द कभी आखरी नहीं होता,
अपनी आँखों में अश्को को बचा कर रखना
सूरज तो रोज ही आता है मगर,
अपने दिलो में ' दीप ' को जला
HAM O GULAB HAI...
हम वो गुलाब है जो टूट कर भी मुस्कान छोड़ जाते हैं,
दुसरों के रिश्ते बनाते फिरते हैं और खुद तन्हा रह जाते हैं ।
दुनिया के प्रेम प्रसंगो में हम गुलाबों को टूटना हीं पड़ता है,
और हमे देने वाले हर प्रेमी को झुकना हीं पड़ता है,
कभी हमे फरमाइश कभी नुमाइश बना दिया,
जी चाहा ज़ुल्फों में लगाया,जी चाहा सेज़ पे सज़ा दिया,
मेरे तन को छेड़ कर , दीवाने कैसे मचल जाते हैं,
दुसरों के रिश्ते बनाते फिरते हैं और खुद तन्हा रह जाते हैं ।
बात अभी इतनी होती तो क्या बात थी,
पर अभी और भी काली होने वाली रात थी,
मेरे अरमानों को कुचल कर इत्र बना दिया,
और दिखावटी शिशियों में भर कर सजा दिया,
हम मर कर भी साँसों में महक छोड़ जाते है,
दुसरों के रिश्ते बनाते फिरते हैं और खुद तन्हा रह जाते हैं
दुसरों के रिश्ते बनाते फिरते हैं और खुद तन्हा रह जाते हैं ।
दुनिया के प्रेम प्रसंगो में हम गुलाबों को टूटना हीं पड़ता है,
और हमे देने वाले हर प्रेमी को झुकना हीं पड़ता है,
कभी हमे फरमाइश कभी नुमाइश बना दिया,
जी चाहा ज़ुल्फों में लगाया,जी चाहा सेज़ पे सज़ा दिया,
मेरे तन को छेड़ कर , दीवाने कैसे मचल जाते हैं,
दुसरों के रिश्ते बनाते फिरते हैं और खुद तन्हा रह जाते हैं ।
बात अभी इतनी होती तो क्या बात थी,
पर अभी और भी काली होने वाली रात थी,
मेरे अरमानों को कुचल कर इत्र बना दिया,
और दिखावटी शिशियों में भर कर सजा दिया,
हम मर कर भी साँसों में महक छोड़ जाते है,
दुसरों के रिश्ते बनाते फिरते हैं और खुद तन्हा रह जाते हैं
अब तो करलो बुद्धि मित्र ठिकाने पर
मुंबई तक रखी हैं आज निशाने पर
200 निर्दोषों को खोकर खामोशी
कब टूटेगी सिंघासन की बेहोशी.
कायरता बर्दास्त करेंगे हम कब तक
आखिर यूँ ही रोज मरेंगे हम कब तक
केवल ये ही निर्णय आज सही होगा
कोई 'शिखंडी' सत्ताधीश नहीं होगा.
...अंधे लालच का सिन्धु भर के चित में
ध्रतराष्ट्र हैं मौन स्वयं सुत के हित में
वरना वो ख़ूनी पंजे तुड़वा देते
अब तक अफजल पर कुत्ते छुड़वा देते.
बेशक सरे भारत का सर झुक जाये
उनकी कोशिश हैं ये फाँसी रुक जाये
निर्णय लेना होगा अब सरकारों को
पहले फाँसी होगी इन गद्दारों को
मुंबई तक रखी हैं आज निशाने पर
200 निर्दोषों को खोकर खामोशी
कब टूटेगी सिंघासन की बेहोशी.
कायरता बर्दास्त करेंगे हम कब तक
आखिर यूँ ही रोज मरेंगे हम कब तक
केवल ये ही निर्णय आज सही होगा
कोई 'शिखंडी' सत्ताधीश नहीं होगा.
...अंधे लालच का सिन्धु भर के चित में
ध्रतराष्ट्र हैं मौन स्वयं सुत के हित में
वरना वो ख़ूनी पंजे तुड़वा देते
अब तक अफजल पर कुत्ते छुड़वा देते.
बेशक सरे भारत का सर झुक जाये
उनकी कोशिश हैं ये फाँसी रुक जाये
निर्णय लेना होगा अब सरकारों को
पहले फाँसी होगी इन गद्दारों को
USNE KITNI SADGI SE...
उसने कितनी सादगी से आज़माया है मुझे
है मेरा दुश्मन मगर मुन्सिफ़ बनाया है मुझे
मैं भला उस शख़्स की मासूमियत को क्या कहूँ
कहके मुझको इक लुटेरा घर बुलाया है मुझे
उसके भोलेपन पर मिट न जाऊँ तो मैं क्या करूँ
किस कदर नफ़रत है मुझसे यह बताया है मुझे
मुझको उसकी दुश्मनी पे नाज़ क्यों न हो कहो
है भरोसा मुझ पे ज़ालिम ने जताया है मुझे
वो कोई इल्ज़ाम दे देता मुझे तो ठीक था
उसकी चुप ने और भी ज़्यादा सताया है मुझे
KUNVR SAMEER SHAHI
है मेरा दुश्मन मगर मुन्सिफ़ बनाया है मुझे
मैं भला उस शख़्स की मासूमियत को क्या कहूँ
कहके मुझको इक लुटेरा घर बुलाया है मुझे
उसके भोलेपन पर मिट न जाऊँ तो मैं क्या करूँ
किस कदर नफ़रत है मुझसे यह बताया है मुझे
मुझको उसकी दुश्मनी पे नाज़ क्यों न हो कहो
है भरोसा मुझ पे ज़ालिम ने जताया है मुझे
वो कोई इल्ज़ाम दे देता मुझे तो ठीक था
उसकी चुप ने और भी ज़्यादा सताया है मुझे
KUNVR SAMEER SHAHI
सोमवार, 21 सितंबर 2009
aaj ki baat
ये कौन सी जमीं है ये कौन सा आसमां
कि हर तरफ है शोरगुल का ही समांसहमा बचपन,
भटका युवा मन नशे की देवी को करता भविष्य अर्पण
अंधी दौड़ में पगलाया, सुलगता जीवनलुटती आबरु,
बहता लहूजलता आशियाना,
वादों का सड़ता खजाना
भूख से व्याकुल सुबह यहां की ठंड से कांपती शाम है।
।।दिलों में उफनती नफरत,
आंखों में तैरता डरघुट घुट कर जीवन वृक्ष रहा है
मरगांव में सूखा पड़ा है कुंआ
किसे है परवाह कि यहां तो जिस्मों से उठ रहा है धुंआ
खून से सने चेहरों पर नाचती वो बेशर्म हंसी
परिचितों में भी महसूस होती अपनों की कमी
टनम पलकों से टपकटी रात गहराती चली जाती है
भरी महफिल में मनहूस तन्हाई काटने चली आती
है कौन सी जमीं है ये कौन सा आसमां
अफसोस क्या यही है मेरा भारत महान
KUNVAR SAMEER SAHI
कि हर तरफ है शोरगुल का ही समांसहमा बचपन,
भटका युवा मन नशे की देवी को करता भविष्य अर्पण
अंधी दौड़ में पगलाया, सुलगता जीवनलुटती आबरु,
बहता लहूजलता आशियाना,
वादों का सड़ता खजाना
भूख से व्याकुल सुबह यहां की ठंड से कांपती शाम है।
।।दिलों में उफनती नफरत,
आंखों में तैरता डरघुट घुट कर जीवन वृक्ष रहा है
मरगांव में सूखा पड़ा है कुंआ
किसे है परवाह कि यहां तो जिस्मों से उठ रहा है धुंआ
खून से सने चेहरों पर नाचती वो बेशर्म हंसी
परिचितों में भी महसूस होती अपनों की कमी
टनम पलकों से टपकटी रात गहराती चली जाती है
भरी महफिल में मनहूस तन्हाई काटने चली आती
है कौन सी जमीं है ये कौन सा आसमां
अफसोस क्या यही है मेरा भारत महान
KUNVAR SAMEER SAHI
रविवार, 20 सितंबर 2009
kavita
आप माहताब तो बेशक हुआ करें
रोशन यहाँ चराग है बचकर चला करें
एक और मुलाकात को वो बेकरार हो
बस पहली मुलाक़ात पे इतना खुला करें
हमने दवा तो की मगर रिश्ते न बच सके
अब दूरियां निभा सकें आओ दुआ करें
खामोशियों का और ही मतलब न ले कोई
होठों का इस्तेमाल भी थोडा किया करें
जाती हैं हिचकियाँ हमें मुश्किल में डाल के
'तनहा' का नाम रात को कम ही लिया करें
रोशन यहाँ चराग है बचकर चला करें
एक और मुलाकात को वो बेकरार हो
बस पहली मुलाक़ात पे इतना खुला करें
हमने दवा तो की मगर रिश्ते न बच सके
अब दूरियां निभा सकें आओ दुआ करें
खामोशियों का और ही मतलब न ले कोई
होठों का इस्तेमाल भी थोडा किया करें
जाती हैं हिचकियाँ हमें मुश्किल में डाल के
'तनहा' का नाम रात को कम ही लिया करें
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