बुधवार, 30 दिसंबर 2009

सिगरेट पीने वाले अब काफी लाभ में रहेंगे। जल्दी ही सिगरेट के हर पैकेट में एक सरकारी कूपन मिलेगा जिससे आप किसी भी अस्पताल में जा कर जांच करवा सकते हैं कि आप कैंसर के शिकार तो नहीं है या कैंसर आपके शरीर में जड़े तो नहीं जमा रहा है। आम तौर पर इस तरह की पड़ताल के लिए पांच हजार रुपए देने पड़ते हैं मगर सिगरेट पीने वालों को तीस से ले कर सौ रुपए तक के पैकेट में यह कूपन मिलेगा। सरकार ने इसे सिगरेट छुड़वाने का एक निर्णायक कदम बताया है लेकिन अस्पताल वालों के लिए यह काफी घाटे का सौदा साबित होने वाला है। लोगों को तम्बाकू उत्पादों के खतरों के प्रति जागरूक करने के लिए सरकार की और पहल। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की नई योजना पर अगर मुहर लग जाती है तो जल्द ही लोगों को सिगरेट के डिब्बों में एक फ्री कूपन मिलेगा। इस कूपन को दिखाकर किसी भी कैंसर अस्पताल में कैंसर का चेकअप कराया जा सकता है। मालूम हो कि सरकार इस बात पर बार-बार जोर देती है कि सिगरेट से कैंसर का खतरा सबसे ज्यादा होता है। अब इस संदेश को और कारगर बनाने के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय ने एक नई योजना बना ली है। इस योजना के तहत सिगरेट के डिब्बों से कैंसर का चेकअप कराने का कूपन मिलेगा। स्वास्थ्य मंत्रालय और परिवार कल्याण मंत्रालय ने मिलकर इस मुहीम को शुरू किया है। मेनका गांधी ने सुझाव दिया है कि सिगरेट बेचने वाली कंपनियों को पैकेट में फ्री कूपन देना चाहिए। हमारे देश में हर साल करीब 9 लाख लोग सिगरेट की वजह से कैंसर के शिकार होकर दम तोड़ देते हैं। इससे पहले लोगों को तम्बाकू उत्पादों के खतरे से आगाह करने के लिए डिब्बों पर बिच्छू की तस्वीर छापने का फैसला किया जा चुका है लेकिन ये तरीका भी बहुत कारगर साबित नहीं हुआ। ज्यादातर लोगों का मानना है कि सिर्फ तस्वीरें दिखाकर किसी को खतरे का एहसास नहीं कराया जा सकता। हो सकता है सरकार की इस नई पहल से लोग सिगरेट से होने वाले खतरों के प्रति जागरूक हो जाएं और सिगरेट छोड़ दें।

आपका सेवक



संकल्प मेहता

शनिवार, 3 अक्टूबर 2009

ek patrkar ki maot se upje kuchh swal

एक पत्रकार की मोत से उपजे कुछ सवाल
जनसत्ता के १३ अगस्त वाले अंक में गोरखपुर से एक खबर छपी थी !मामला था वही के एक पत्रकार कृष्ण कुमार की इलाज के अभाव में मो़त का -''जनसत्ता के अनुसार कृष्ण कुमार कुल ४६ वर्ष के थे !गत २० सालो से वह प्रिंट मीडिया से जुड़े थे !गीता प्रेस गोरखपुर से अपना पत्रिकारिता जीवन प्रारम्भ करने वाले कृष्ण कुमार रास्ट्रीय सहारा सहित कई अखबारों से जुड़े थे !वे दैनिक आज में रिपोर्टर थे !वह गुर्दे की वीमारी से ग्रस्त थे आऊर उनका एक गुर्दा प्रत्यारोपित किया गया था !वह भी यह टीबी संभव हो पाया जब तीन लाख रुपए गोरखपुर प्रेस क्लब व तीन लाख रुपए तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने दिया था !उसके बाद इस खर्चीले इलाज में उनके जीवन भर की कमाई व पुस्तैनी ज़मीं भी स्वाहा हो गयी !फिर भी उनका स्वास्थ्य नहीं सुधरा डाक्टरों के मुताबिक उनके इलाज के लिए हर माह ५ हज़ार रुपए की जरूरत थी !जिसका इंतजाम न हो पाने के कारण उनके परिवार वाले जब उन्हें लखनऊ से घर वापस ला रहे थे की रास्ते में उनकी दर्द नाक मो़त हो गयी !
यह संक्षिप्त विवरण कई सन्देश देता है '' की समाचारपत्र उधोग में कर्मचारियों को किसी भी प्रकार की सुरक्षा नही रही न ही नोकरी की न ही स्वास्थ्य की यह असुरक्षा छोटे अखबारों में अपने चरम पर है !जन्हा न तो कोई सेवा शर्ते लागू होती है न ही वेतन मान !उदारीकरण के बाद जिस तरह अखबारों में अनुबंध पर काम करने का चलन बढा उसने छोटे अखबारों के पत्रकारों को दैनिक मजदूरो से भी बदतर हालत में ला दिया !कृष्ण कुमार की मो़त के संदर्भ में सवाल पूछा जा सकता है की ''की अपने एक कर्मचारी के लिए कुछ समय के लिए ५ हज़ार रुपए महिना निकालना क्या असम्भव काम है !अख़बार ने अपनी इनकम बढाने के लिए पत्रकारों के काम के घंटे व काम के आकर को ही नहीं बढाया बल्कि उनके वेतनों में भी भरी कमी की !सरकारी नोकरियो के सिकुड़ने के कारण परम्परागत सिक्षा पाए युआवो में बेरोजगारी के चरम पर पहुचने से पत्रकारिता में नो़करी पाने का दबाब बढ गया !
स्थान्यीय अखबारों द्वारा अपने रिपोर्टरों को अपने काम के अलावा विज्ञापन लाने के लिए भी मजबूर करना आम बात हो गयी है बीते लोकसभा चुनाव में जिस तरह से उनसे समाचार छपने के लिए पैसा लिया गया !उसके मालिको ने जम कर पत्रकारों का उपयोग किया इन सब बातो ने पत्रकारिता के वयवसाय को एक ऐसे असुरक्षित आऊर निहायत हे सामान्य पेशे में बदल दिया है जिसका सम्बन्ध किसी भी तरह की नैतिकता आऊर मूल्यों से नही होता है !जिसमे विवेक शब्द का कोई अर्थ ही नही रहा !किसी दुकान में काम करना या किसी अख़बार में काम करने में कोई अंतर नही रहा !इस बीच सच यह है की अखबारों के लाभ में जमकर उफान आया आऊर अख़बार एक के बाद एक संस्करण निकालते चले गये !दुश्री तरफ ये अख़बार अपने कर्मचारियों को स्वाथ्य सम्बन्धी तो दूर सेवानिवृत्त के बाद के लाभ से भी बचे हुए है !उदारीकरण के बाद से पत्रकारों व मजदुर संगठनो का सरकार की मदद से पूरी तरह सफाया कर दिया गया !अमेरिका जैसे देश में अखबारों के बहुसंस्क्र्ण निकालने पर पाबन्दी है इतना ही नही वह समाचार पत्रों की निगरानी के लिए नियामक आयोग है पर हमारे यंहा नही चलता है ये सब !दूसरी तरफ मालिको के सत्ताधारी डालो से निकट सम्बन्ध है वे उनके टिकट पर चुनाव ही नही लड़ते बल्कि राज्यसभा में भी पहुचते है आऊर खुलेआम अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर लगातार छूट लेते रहते है आऊर कोई ऐसा नियम नही बन्ने देते जो उनके जिम्मेदारियों को तय करे !साफ़ है की कृष्ण कुमार की मो़त असल में अखबारी उद्योग की व्येवास्थाग्त खराबियों से जुडी है !बताना जरुरी है की अगर इसको नियंत्रित करने के कदम अब भी नही उठाए गए तो आने वाले दिनों में ऐसी मो़तो के समाचार समाचार केन्द्रों से रोज़ मिलने लगेगे !
कुंवर समीर शाही अयोध्या से

गुरुवार, 1 अक्टूबर 2009

जो रिश्ते है हकीक़त में वो अब रिश्ते नहीं होते
हमें जो लगते है अपने वही अपने नहीं होते !

कशिश होती है कुछ फूलो में पर खुस्बो नहीं होती
ये अच्छी सूरत वाले सभी अच्छे नहीं होते !

इन्हें जो भी बनाते है वो हम तुम ही बनाते है
किसी मजहब की साजिश में कभी बच्चे नहीं होते !

सभी के पेट को रोटी, बदन पे कपडे, सर पे छत
बहुत अच्छे है ये सपने मगर सच्चे नहीं होते !

पसीने की सियाही से जो लिखते है इरादों को
"समीर " उनके मुकद्दर के सफे कोरे नहीं होते !

सोमवार, 28 सितंबर 2009

दरोगा साहब की कारस्तानी तो देखिये
फैजाबाद पुलिस की सजगता को प्रदर्शित करती एक खबर २८ सितम्बर को उपरोक्त शीर्षक से छपी जिसे पढ़कर बड़ी कोफ्त हुई की आखिर उस देश का क्या होगा जिसके रक्षक प्रहरी इतने लापरवाह होगे ..की उनके तकिये के नीचे से चोर उनकी सर्विस रिवाल्वर व तीन मोबाइल भी उठा ले गए .इन सारे सामानों के गायब होने की खबर अमृत लाल नामक दरोगा को सुबह पता चली आनन फानन में खबर जंगल में आग के तरह फैली पुलिस महकमे के आला अधिकारी एस एस पी ने जाँच सीओ स्तर के अधिकारी को दे दिया इतना ही नहीं दरोगा ने अज्ञात लोगो के खिलाफ थाना पुराकलंदर में अपराध नम्बर ८३७ /०९ धारा ३८० के तहत मामला भी दर्ज करा दिया ..यह तो रही घटना ...अब इस घटना की जानकारी होने के बाद आम जनता इन निकम्मे पुलिस वालो पर कैसे भरोषा करे नये पुलिस महानिदेशक कर्मबीर सिंह जी अपने इन लापरवाह पुलिस वालो को कैसे सुधारेगे..अरे कुछ करिए साहब ....

मंगलवार, 22 सितंबर 2009

आप भी अब मिरे गम बढ़ा दीजिए
मुझको लंबी उमर की दुआ दीजिए
मैने पहने है कपड़े, धुले आज फिर
तोहमते अब नई कुछ लगा दीजिए
रोशनी के लिए, इन अंधेरों में अब कुछ नही
तो मिरा दिल जला दीजिए
चाप कदमों की अपनी मैं पहचान लूं
आईने से यूँ मुझको मिला दीजिए
गर मुहब्बत ज़माने में है इक खता
आप मुझको भी कोई सज़ा दीजिए
अपने दिल को पत्थर का बना कर रखना,
हर चोट के निशान को सजा कर रखना

उड़ना हवा में खुल कर लेकिन,
अपने कदमों को ज़मी से मिला कर रखना

छाव में माना सुकून मिलता है बहुत,
फिर भी धूप में खुद को जला कर रखना

उम्रभर साथ तो रिश्ते नहीं रहते हैं,
यादों में हर किसी को जिन्दा रखना

वक्त के साथ चलते-चलते , खो ना जाना,
खुद को दुनिया से छिपा कर रखना

रातभर जाग कर रोना चाहो जो कभी,
अपने चेहरे को दोस्तों से छिपा कर रखना

तुफानो को कब तक रोक सकोगे तुम,
कश्ती और मांझी का याद पता रखना

हर कहीं जिन्दगी एक सी ही होती हैं,
अपने ज़ख्मों को अपनो को बता कर रखना

मन्दिरो में ही मिलते हो भगवान जरुरी नहीं,
हर किसी से रिश्ता बना कर रखना

मरना जीना बस में कहाँ है अपने,
हर पल में जिन्दगी का लुफ्त उठाये रखना

दर्द कभी आखरी नहीं होता,
अपनी आँखों में अश्को को बचा कर रखना

सूरज तो रोज ही आता है मगर,
अपने दिलो में ' दीप ' को जला

HAM O GULAB HAI...

हम वो गुलाब है जो टूट कर भी मुस्कान छोड़ जाते हैं,
दुसरों के रिश्ते बनाते फिरते हैं और खुद तन्हा रह जाते हैं ।

दुनिया के प्रेम प्रसंगो में हम गुलाबों को टूटना हीं पड़ता है,
और हमे देने वाले हर प्रेमी को झुकना हीं पड़ता है,
कभी हमे फरमाइश कभी नुमाइश बना दिया,
जी चाहा ज़ुल्फों में लगाया,जी चाहा सेज़ पे सज़ा दिया,
मेरे तन को छेड़ कर , दीवाने कैसे मचल जाते हैं,
दुसरों के रिश्ते बनाते फिरते हैं और खुद तन्हा रह जाते हैं ।

बात अभी इतनी होती तो क्या बात थी,
पर अभी और भी काली होने वाली रात थी,
मेरे अरमानों को कुचल कर इत्र बना दिया,
और दिखावटी शिशियों में भर कर सजा दिया,
हम मर कर भी साँसों में महक छोड़ जाते है,
दुसरों के रिश्ते बनाते फिरते हैं और खुद तन्हा रह जाते हैं
अब तो करलो बुद्धि मित्र ठिकाने पर
मुंबई तक रखी हैं आज निशाने पर
200 निर्दोषों को खोकर खामोशी
कब टूटेगी सिंघासन की बेहोशी.
कायरता बर्दास्त करेंगे हम कब तक
आखिर यूँ ही रोज मरेंगे हम कब तक
केवल ये ही निर्णय आज सही होगा
कोई 'शिखंडी' सत्ताधीश नहीं होगा.
...अंधे लालच का सिन्धु भर के चित में
ध्रतराष्ट्र हैं मौन स्वयं सुत के हित में
वरना वो ख़ूनी पंजे तुड़वा देते
अब तक अफजल पर कुत्ते छुड़वा देते.
बेशक सरे भारत का सर झुक जाये
उनकी कोशिश हैं ये फाँसी रुक जाये
निर्णय लेना होगा अब सरकारों को
पहले फाँसी होगी इन गद्दारों को

USNE KITNI SADGI SE...

उसने कितनी सादगी से आज़माया है मुझे
है मेरा दुश्मन मगर मुन्सिफ़ बनाया है मुझे
मैं भला उस शख़्स की मासूमियत को क्या कहूँ
कहके मुझको इक लुटेरा घर बुलाया है मुझे
उसके भोलेपन पर मिट न जाऊँ तो मैं क्या करूँ
किस कदर नफ़रत है मुझसे यह बताया है मुझे
मुझको उसकी दुश्मनी पे नाज़ क्यों न हो कहो
है भरोसा मुझ पे ज़ालिम ने जताया है मुझे
वो कोई इल्ज़ाम दे देता मुझे तो ठीक था
उसकी चुप ने और भी ज़्यादा सताया है मुझे
KUNVR SAMEER SHAHI

सोमवार, 21 सितंबर 2009

aaj ki baat

ये कौन सी जमीं है ये कौन सा आसमां
कि हर तरफ है शोरगुल का ही समांसहमा बचपन,
भटका युवा मन नशे की देवी को करता भविष्य अर्पण
अंधी दौड़ में पगलाया, सुलगता जीवनलुटती आबरु,
बहता लहूजलता आशियाना,
वादों का सड़ता खजाना
भूख से व्याकुल सुबह यहां की ठंड से कांपती शाम है।
।।दिलों में उफनती नफरत,
आंखों में तैरता डरघुट घुट कर जीवन वृक्ष रहा है
मरगांव में सूखा पड़ा है कुंआ
किसे है परवाह कि यहां तो जिस्मों से उठ रहा है धुंआ
खून से सने चेहरों पर नाचती वो बेशर्म हंसी
परिचितों में भी महसूस होती अपनों की कमी
टनम पलकों से टपकटी रात गहराती चली जाती है
भरी महफिल में मनहूस तन्हाई काटने चली आती
है कौन सी जमीं है ये कौन सा आसमां
अफसोस क्या यही है मेरा भारत महान
KUNVAR SAMEER SAHI

रविवार, 20 सितंबर 2009

kavita

आप माहताब तो बेशक हुआ करें
रोशन यहाँ चराग है बचकर चला करें
एक और मुलाकात को वो बेकरार हो
बस पहली मुलाक़ात पे इतना खुला करें
हमने दवा तो की मगर रिश्ते न बच सके
अब दूरियां निभा सकें आओ दुआ करें
खामोशियों का और ही मतलब न ले कोई
होठों का इस्तेमाल भी थोडा किया करें
जाती हैं हिचकियाँ हमें मुश्किल में डाल के
'तनहा' का नाम रात को कम ही लिया करें