गुरुवार, 1 अक्टूबर 2009

जो रिश्ते है हकीक़त में वो अब रिश्ते नहीं होते
हमें जो लगते है अपने वही अपने नहीं होते !

कशिश होती है कुछ फूलो में पर खुस्बो नहीं होती
ये अच्छी सूरत वाले सभी अच्छे नहीं होते !

इन्हें जो भी बनाते है वो हम तुम ही बनाते है
किसी मजहब की साजिश में कभी बच्चे नहीं होते !

सभी के पेट को रोटी, बदन पे कपडे, सर पे छत
बहुत अच्छे है ये सपने मगर सच्चे नहीं होते !

पसीने की सियाही से जो लिखते है इरादों को
"समीर " उनके मुकद्दर के सफे कोरे नहीं होते !

1 टिप्पणी:

  1. संजदगी भरी रचना ...आपके ब्लॉग पर अनायास आया ,अच्छा लगा ..कभी हमारे ब्लॉग पर भी दस्तक दे .....

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