बाल ठाकरे के बारे में ऐसा कुछ नया नहीं हैं जो कहा जा सके। लेकिन पुराना इतना है और उसे वे फिर से घृणा का हिमालय बना देने पर तुले हुए हैं कि अगर इतने बुजुर्ग नहीं होते तो कनपटी के नीचे मारने का मन करता है। टपोरी भाषा बोलते हैं, मवालियों की तरह धमकी देते और दिलवाते है और ऐलानिया कहते है कि मुंबई सिर्फ मराठियों की है और यहां वही होगा जो शिवसेना चाहेगी।
आपको याद दिलाने की जरूरत नहीं कि दाऊद इब्राहीम के समधी जावेद मियादाद से ठाकरे की कितनी अंतरंगता रही है। इसके तो पोस्टर छप चुके है। बेचारे उध्दव ठाकरे जिन्हें ठीक से बोलना भी नहीं आता, कहते हैं कि जावेद मियादाद भारत में पाकिस्तान को खेलने देने की अनुमति मांगने आए थे। यह किसी को पता नहीं कि ठाकरे भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के मुखिया कब बने थे जो पाकिस्तान के कप्तान को उनसे खेलने की अनुमति मांगनी पड़े?
विचित्र यह लगता है कि बाल ठाकरे पढ़े लिखे आदमी है। फ्री प्रेस जनरल में अंग्रेजी के कार्टूनिस्ट हुआ करते थे और देश के सबसे बड़े कार्टूनिस्ट आर के लक्ष्मण के दोस्त है। लक्ष्मण तमिलनाडु के हैं और ठाकरे को शिवसेना अध्यक्ष के अवतार में तमिल लोग भी पसंद नहीं है। उन्हें अंडरवर्ल्ड सरगना छोटा राजन और अरुण गवली से सहानुभूति हैं क्योंकि ये दोनों मराठी माणुष है। दाऊद और अबू सालेम उनके लिए खलनायक है। जैसे दाऊद की डी कंपनी चलती है वैसे ही मुंबई में ठाकरे की 'टी' कंपनी चल रही है।
डी कंपनी भी बॉलीवुड पर धौंस जमा कर वसूली करती है और टी कंपनी भी कुल मिला कर बॉलीवुड को काबू में रखना चाहती है। अब शाहरूख खान का क्या कहा जाए। उन्हें तो पता ही नहीं होता कि वे कब क्या बोल रहे है। आईपीएल में खुद उन्होंने पाकिस्तानी खिलाड़ियों को हाथ नहीं लगाया और फिर इस सामूहिक और सोचे समझे बहिष्कार को मजहब का नाम दे कर कहा कि गलत हुआ है। फिर सचिन तेदुंलकर की तर्ज पर कहा कि पाकिस्तान और भारत के साथ खेल के रिश्ते कायम रहने चाहिए।
ठाकरे गिरोह ने शाहरूख से कहा कि माफी मांगो। शाहरूख अमेरिका में अपनी फिल्म माइ नेम इज खान का प्रचार करने गए थे। वहीं से बोले कि मैं माफी नहीं मागूंगा। ठाकरे का एक चमचा और सामना नाम के पर्चे का संपादक बोला कि अमेरिका में बैठ कर बोलना आसान है लेकिन शाहरूख खान को याद रखना चाहिए कि वे मुंबई में रहते हैं और उनका परिवार भी है। लौट कर आएं तो निपट लिया जाएगा। यह जान से मारने की खुली धमकी है और भारतीय दंड विधान की धारा 506 के तहत गैर जमानती अपराध है। मगर ठाकरे के संपादक को चव्हाण की पुलिस भी हाथ नहीं लगाती।
दूसरी तरफ अपने बिग बी हैं जो इन दिनों नरेंद्र मोदी के भक्त के अवतार में हैं और गुजरात सरकार के ब्रांड एंबेसडर खुद प्रस्ताव कर के बने है। बिग बी यानी अमिताभ बच्चन ने अनिल अंबानी की कंपनी द्वारा चलाए जा रहे ब्लॉग बिग अड्डा पर दूसरे बिग बी यानी बाल ठाकरे का जो स्तुतिगान किया है उससे अपने जैसे प्रचंड अमिताभ प्रशंसकों को भी शर्म आने लगी है। अमिताभ बच्चन को बाल ठाकरे की वाणी में अंगारे दिखते हैं, आत्मा में ज्वाला दिखती हैं और मन में देशभक्ति नजर आती है। अमिताभ बच्चन कुल मिला कर बार बार अपने कायर होने का परिचय देते रहे है। एक बार जया बच्चन ने जब हिंदी में बोलने पर ठाकरे के घर जा कर माफी मांगी थी तब भी बहुत अटपटा लगा था। खास तौर पर इसलिए कि अपन बचपन से जया बच्चन रहे हैं और जब चौदह साल के थे तो गुड्डी फिल्म देख कर उनसे शादी का इरादा बना लिया था और बाकायदा बांग्ला सीखनी शुरू कर दी थी।
मगर बाल ठाकरे मुंबई पर मराठियों और सिर्फ मराठियों का अधिकार चाहते हैं तो यह सोचने वाली बात है। आपने गौर किया होगा कि शिव सैनिक जब सड़कों पर तांडव मचाने निकलते हैं तो पूरा ठाकरे कुटुंब अपने घरों में कैद रहता है। उनकी सड़कों पर निकलने की हिम्मत नहीं होती। नाम शिवाजी का लेते हैं मगर काम औरंगजेब वाला करते है। और अगर कहीं हिंदी भाषी प्रतिशोध और प्रतिकार की मुद्रा में आ गए तो शिव सैनिकों को मुंह छिपाने की जगह नहीं मिलेगी। मुंबई में करीब चालीस लाख हिंदी भाषी हैं जो सहिष्णु भी हैं और अपने काम से काम रखते है। हर मराठी शिव सैनिक नहीं है। इसलिए हिंदी भाषियों का स्वाभिमान अगर प्रतिकार में बदल गया तो ठाकरे बहुत ठुकेंगे।
गौर करने की बात यह भी है कि ठाकरे के तथाकथित मराठी अस्मिता के मुद्दे को किसी और दल या संगठन ने नहीं अपनाया। दिल्ली में भी कुछ नहीं तो चार पांच लाख मराठी तो रहते ही हैं और उन्हें हिंदी से कोई तकलीफ नहीं है। ग्वालियर और इंदौर जैसे शहरों में चूंकि एक समय मराठियाें का राज था इसलिए अच्छी खासी मराठी जनसंख्या इन दोनों शहरों में हैं और वहां मराठी और हिंदी का झगड़ा कभी नहीं हुआ। ठाकरे नाम के एक गुंडे ने भारत की माया नगरी को देश का यातना शिविर बना दिया है।
ठाकरे की उम्र हो चली है और जिस उम्र में लोगाें को सम्मान मिलना चाहिए उसमें ठाकरे देश भर के खलनायक बन गए। बेटे उध्दव को भी उन्हो।ने घृणा की शिक्षा दी है और उध्दव की तोतली जुबान में बाल ठाकरे जैसी उग्रता नहीं है। राज ठाकरे ने बाल ठाकरे का उत्तराधिकार बाकायदा छीना है। जब बाल ठाकरे मुंबई में नफरत की आंधी चलवाते हैं तो एक तरह से वे राज ठाकरे से हिसाब बराबर भी कर रहे होते है।
ठाकरे की तथाकथित मराठी अस्मिता के मुद्दे को और किसी को दल या संगठन ने नहीं अपनाया। यहां तक कि संघ परिवार के स्वयं सेवकाें को भी फरमान मिल गया है कि वे उत्तर भारतीयों की रक्षा करे। जाहिर है कि संघ परिवार का आधार मूल रूप से उत्तर भारत में हैं और भाजपा की आधार भूमि भी वहीं है। संघ के स्वयं सेवकों को शाखा में सबसे पहले लाठी चलाना सिखाया जाता है और संघ मुख्यालय में मोहन भागवत से ले कर राम माधव तक जितने मराठी है उतने शिवसेना मुख्यालय में नहीं होंगे। इसलिए बाल ठाकरे को अपनी विनम्र सलाह है कि वे अपना बुढ़ापा खराब नहीं करे। फिर भी अगर निपटना चाहते हैं तो अपनी गली से बाहर निकले और एंबुलेंस साथ में ले कर आए। देश की बहुत बड़ी जनसंख्या उन्हें कंबल में लपेट कर उनका जूता सत्कार करने का इंतजार कर रही है। वैसे बाल ठाकरे को अगर अपनी वंशावली याद हो तो उनके पुरखें मध्य प्रदेश के खंडवा से मुंबई आ कर बसे थे। ये वही खंडवा है जहां से किशोर कुमार और अशोक कुमार मुंबई आए थे। इतने सुरीले खंडवा का नाम भी ठाकरे बदनाम कर रहे है। उन पर पुरखों की जमीन को लांछित करने का अपराध भी साबित होता है।
रविवार, 7 फ़रवरी 2010
बुधवार, 30 दिसंबर 2009
सिगरेट पीने वाले अब काफी लाभ में रहेंगे। जल्दी ही सिगरेट के हर पैकेट में एक सरकारी कूपन मिलेगा जिससे आप किसी भी अस्पताल में जा कर जांच करवा सकते हैं कि आप कैंसर के शिकार तो नहीं है या कैंसर आपके शरीर में जड़े तो नहीं जमा रहा है। आम तौर पर इस तरह की पड़ताल के लिए पांच हजार रुपए देने पड़ते हैं मगर सिगरेट पीने वालों को तीस से ले कर सौ रुपए तक के पैकेट में यह कूपन मिलेगा। सरकार ने इसे सिगरेट छुड़वाने का एक निर्णायक कदम बताया है लेकिन अस्पताल वालों के लिए यह काफी घाटे का सौदा साबित होने वाला है। लोगों को तम्बाकू उत्पादों के खतरों के प्रति जागरूक करने के लिए सरकार की और पहल। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की नई योजना पर अगर मुहर लग जाती है तो जल्द ही लोगों को सिगरेट के डिब्बों में एक फ्री कूपन मिलेगा। इस कूपन को दिखाकर किसी भी कैंसर अस्पताल में कैंसर का चेकअप कराया जा सकता है। मालूम हो कि सरकार इस बात पर बार-बार जोर देती है कि सिगरेट से कैंसर का खतरा सबसे ज्यादा होता है। अब इस संदेश को और कारगर बनाने के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय ने एक नई योजना बना ली है। इस योजना के तहत सिगरेट के डिब्बों से कैंसर का चेकअप कराने का कूपन मिलेगा। स्वास्थ्य मंत्रालय और परिवार कल्याण मंत्रालय ने मिलकर इस मुहीम को शुरू किया है। मेनका गांधी ने सुझाव दिया है कि सिगरेट बेचने वाली कंपनियों को पैकेट में फ्री कूपन देना चाहिए। हमारे देश में हर साल करीब 9 लाख लोग सिगरेट की वजह से कैंसर के शिकार होकर दम तोड़ देते हैं। इससे पहले लोगों को तम्बाकू उत्पादों के खतरे से आगाह करने के लिए डिब्बों पर बिच्छू की तस्वीर छापने का फैसला किया जा चुका है लेकिन ये तरीका भी बहुत कारगर साबित नहीं हुआ। ज्यादातर लोगों का मानना है कि सिर्फ तस्वीरें दिखाकर किसी को खतरे का एहसास नहीं कराया जा सकता। हो सकता है सरकार की इस नई पहल से लोग सिगरेट से होने वाले खतरों के प्रति जागरूक हो जाएं और सिगरेट छोड़ दें।
आपका सेवक
संकल्प मेहता
आपका सेवक
संकल्प मेहता
शनिवार, 3 अक्टूबर 2009
ek patrkar ki maot se upje kuchh swal
एक पत्रकार की मोत से उपजे कुछ सवाल
जनसत्ता के १३ अगस्त वाले अंक में गोरखपुर से एक खबर छपी थी !मामला था वही के एक पत्रकार कृष्ण कुमार की इलाज के अभाव में मो़त का -''जनसत्ता के अनुसार कृष्ण कुमार कुल ४६ वर्ष के थे !गत २० सालो से वह प्रिंट मीडिया से जुड़े थे !गीता प्रेस गोरखपुर से अपना पत्रिकारिता जीवन प्रारम्भ करने वाले कृष्ण कुमार रास्ट्रीय सहारा सहित कई अखबारों से जुड़े थे !वे दैनिक आज में रिपोर्टर थे !वह गुर्दे की वीमारी से ग्रस्त थे आऊर उनका एक गुर्दा प्रत्यारोपित किया गया था !वह भी यह टीबी संभव हो पाया जब तीन लाख रुपए गोरखपुर प्रेस क्लब व तीन लाख रुपए तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने दिया था !उसके बाद इस खर्चीले इलाज में उनके जीवन भर की कमाई व पुस्तैनी ज़मीं भी स्वाहा हो गयी !फिर भी उनका स्वास्थ्य नहीं सुधरा डाक्टरों के मुताबिक उनके इलाज के लिए हर माह ५ हज़ार रुपए की जरूरत थी !जिसका इंतजाम न हो पाने के कारण उनके परिवार वाले जब उन्हें लखनऊ से घर वापस ला रहे थे की रास्ते में उनकी दर्द नाक मो़त हो गयी !
यह संक्षिप्त विवरण कई सन्देश देता है '' की समाचारपत्र उधोग में कर्मचारियों को किसी भी प्रकार की सुरक्षा नही रही न ही नोकरी की न ही स्वास्थ्य की यह असुरक्षा छोटे अखबारों में अपने चरम पर है !जन्हा न तो कोई सेवा शर्ते लागू होती है न ही वेतन मान !उदारीकरण के बाद जिस तरह अखबारों में अनुबंध पर काम करने का चलन बढा उसने छोटे अखबारों के पत्रकारों को दैनिक मजदूरो से भी बदतर हालत में ला दिया !कृष्ण कुमार की मो़त के संदर्भ में सवाल पूछा जा सकता है की ''की अपने एक कर्मचारी के लिए कुछ समय के लिए ५ हज़ार रुपए महिना निकालना क्या असम्भव काम है !अख़बार ने अपनी इनकम बढाने के लिए पत्रकारों के काम के घंटे व काम के आकर को ही नहीं बढाया बल्कि उनके वेतनों में भी भरी कमी की !सरकारी नोकरियो के सिकुड़ने के कारण परम्परागत सिक्षा पाए युआवो में बेरोजगारी के चरम पर पहुचने से पत्रकारिता में नो़करी पाने का दबाब बढ गया !
स्थान्यीय अखबारों द्वारा अपने रिपोर्टरों को अपने काम के अलावा विज्ञापन लाने के लिए भी मजबूर करना आम बात हो गयी है बीते लोकसभा चुनाव में जिस तरह से उनसे समाचार छपने के लिए पैसा लिया गया !उसके मालिको ने जम कर पत्रकारों का उपयोग किया इन सब बातो ने पत्रकारिता के वयवसाय को एक ऐसे असुरक्षित आऊर निहायत हे सामान्य पेशे में बदल दिया है जिसका सम्बन्ध किसी भी तरह की नैतिकता आऊर मूल्यों से नही होता है !जिसमे विवेक शब्द का कोई अर्थ ही नही रहा !किसी दुकान में काम करना या किसी अख़बार में काम करने में कोई अंतर नही रहा !इस बीच सच यह है की अखबारों के लाभ में जमकर उफान आया आऊर अख़बार एक के बाद एक संस्करण निकालते चले गये !दुश्री तरफ ये अख़बार अपने कर्मचारियों को स्वाथ्य सम्बन्धी तो दूर सेवानिवृत्त के बाद के लाभ से भी बचे हुए है !उदारीकरण के बाद से पत्रकारों व मजदुर संगठनो का सरकार की मदद से पूरी तरह सफाया कर दिया गया !अमेरिका जैसे देश में अखबारों के बहुसंस्क्र्ण निकालने पर पाबन्दी है इतना ही नही वह समाचार पत्रों की निगरानी के लिए नियामक आयोग है पर हमारे यंहा नही चलता है ये सब !दूसरी तरफ मालिको के सत्ताधारी डालो से निकट सम्बन्ध है वे उनके टिकट पर चुनाव ही नही लड़ते बल्कि राज्यसभा में भी पहुचते है आऊर खुलेआम अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर लगातार छूट लेते रहते है आऊर कोई ऐसा नियम नही बन्ने देते जो उनके जिम्मेदारियों को तय करे !साफ़ है की कृष्ण कुमार की मो़त असल में अखबारी उद्योग की व्येवास्थाग्त खराबियों से जुडी है !बताना जरुरी है की अगर इसको नियंत्रित करने के कदम अब भी नही उठाए गए तो आने वाले दिनों में ऐसी मो़तो के समाचार समाचार केन्द्रों से रोज़ मिलने लगेगे !
कुंवर समीर शाही अयोध्या से
जनसत्ता के १३ अगस्त वाले अंक में गोरखपुर से एक खबर छपी थी !मामला था वही के एक पत्रकार कृष्ण कुमार की इलाज के अभाव में मो़त का -''जनसत्ता के अनुसार कृष्ण कुमार कुल ४६ वर्ष के थे !गत २० सालो से वह प्रिंट मीडिया से जुड़े थे !गीता प्रेस गोरखपुर से अपना पत्रिकारिता जीवन प्रारम्भ करने वाले कृष्ण कुमार रास्ट्रीय सहारा सहित कई अखबारों से जुड़े थे !वे दैनिक आज में रिपोर्टर थे !वह गुर्दे की वीमारी से ग्रस्त थे आऊर उनका एक गुर्दा प्रत्यारोपित किया गया था !वह भी यह टीबी संभव हो पाया जब तीन लाख रुपए गोरखपुर प्रेस क्लब व तीन लाख रुपए तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने दिया था !उसके बाद इस खर्चीले इलाज में उनके जीवन भर की कमाई व पुस्तैनी ज़मीं भी स्वाहा हो गयी !फिर भी उनका स्वास्थ्य नहीं सुधरा डाक्टरों के मुताबिक उनके इलाज के लिए हर माह ५ हज़ार रुपए की जरूरत थी !जिसका इंतजाम न हो पाने के कारण उनके परिवार वाले जब उन्हें लखनऊ से घर वापस ला रहे थे की रास्ते में उनकी दर्द नाक मो़त हो गयी !
यह संक्षिप्त विवरण कई सन्देश देता है '' की समाचारपत्र उधोग में कर्मचारियों को किसी भी प्रकार की सुरक्षा नही रही न ही नोकरी की न ही स्वास्थ्य की यह असुरक्षा छोटे अखबारों में अपने चरम पर है !जन्हा न तो कोई सेवा शर्ते लागू होती है न ही वेतन मान !उदारीकरण के बाद जिस तरह अखबारों में अनुबंध पर काम करने का चलन बढा उसने छोटे अखबारों के पत्रकारों को दैनिक मजदूरो से भी बदतर हालत में ला दिया !कृष्ण कुमार की मो़त के संदर्भ में सवाल पूछा जा सकता है की ''की अपने एक कर्मचारी के लिए कुछ समय के लिए ५ हज़ार रुपए महिना निकालना क्या असम्भव काम है !अख़बार ने अपनी इनकम बढाने के लिए पत्रकारों के काम के घंटे व काम के आकर को ही नहीं बढाया बल्कि उनके वेतनों में भी भरी कमी की !सरकारी नोकरियो के सिकुड़ने के कारण परम्परागत सिक्षा पाए युआवो में बेरोजगारी के चरम पर पहुचने से पत्रकारिता में नो़करी पाने का दबाब बढ गया !
स्थान्यीय अखबारों द्वारा अपने रिपोर्टरों को अपने काम के अलावा विज्ञापन लाने के लिए भी मजबूर करना आम बात हो गयी है बीते लोकसभा चुनाव में जिस तरह से उनसे समाचार छपने के लिए पैसा लिया गया !उसके मालिको ने जम कर पत्रकारों का उपयोग किया इन सब बातो ने पत्रकारिता के वयवसाय को एक ऐसे असुरक्षित आऊर निहायत हे सामान्य पेशे में बदल दिया है जिसका सम्बन्ध किसी भी तरह की नैतिकता आऊर मूल्यों से नही होता है !जिसमे विवेक शब्द का कोई अर्थ ही नही रहा !किसी दुकान में काम करना या किसी अख़बार में काम करने में कोई अंतर नही रहा !इस बीच सच यह है की अखबारों के लाभ में जमकर उफान आया आऊर अख़बार एक के बाद एक संस्करण निकालते चले गये !दुश्री तरफ ये अख़बार अपने कर्मचारियों को स्वाथ्य सम्बन्धी तो दूर सेवानिवृत्त के बाद के लाभ से भी बचे हुए है !उदारीकरण के बाद से पत्रकारों व मजदुर संगठनो का सरकार की मदद से पूरी तरह सफाया कर दिया गया !अमेरिका जैसे देश में अखबारों के बहुसंस्क्र्ण निकालने पर पाबन्दी है इतना ही नही वह समाचार पत्रों की निगरानी के लिए नियामक आयोग है पर हमारे यंहा नही चलता है ये सब !दूसरी तरफ मालिको के सत्ताधारी डालो से निकट सम्बन्ध है वे उनके टिकट पर चुनाव ही नही लड़ते बल्कि राज्यसभा में भी पहुचते है आऊर खुलेआम अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर लगातार छूट लेते रहते है आऊर कोई ऐसा नियम नही बन्ने देते जो उनके जिम्मेदारियों को तय करे !साफ़ है की कृष्ण कुमार की मो़त असल में अखबारी उद्योग की व्येवास्थाग्त खराबियों से जुडी है !बताना जरुरी है की अगर इसको नियंत्रित करने के कदम अब भी नही उठाए गए तो आने वाले दिनों में ऐसी मो़तो के समाचार समाचार केन्द्रों से रोज़ मिलने लगेगे !
कुंवर समीर शाही अयोध्या से
गुरुवार, 1 अक्टूबर 2009
जो रिश्ते है हकीक़त में वो अब रिश्ते नहीं होते
हमें जो लगते है अपने वही अपने नहीं होते !
कशिश होती है कुछ फूलो में पर खुस्बो नहीं होती
ये अच्छी सूरत वाले सभी अच्छे नहीं होते !
इन्हें जो भी बनाते है वो हम तुम ही बनाते है
किसी मजहब की साजिश में कभी बच्चे नहीं होते !
सभी के पेट को रोटी, बदन पे कपडे, सर पे छत
बहुत अच्छे है ये सपने मगर सच्चे नहीं होते !
पसीने की सियाही से जो लिखते है इरादों को
"समीर " उनके मुकद्दर के सफे कोरे नहीं होते !
हमें जो लगते है अपने वही अपने नहीं होते !
कशिश होती है कुछ फूलो में पर खुस्बो नहीं होती
ये अच्छी सूरत वाले सभी अच्छे नहीं होते !
इन्हें जो भी बनाते है वो हम तुम ही बनाते है
किसी मजहब की साजिश में कभी बच्चे नहीं होते !
सभी के पेट को रोटी, बदन पे कपडे, सर पे छत
बहुत अच्छे है ये सपने मगर सच्चे नहीं होते !
पसीने की सियाही से जो लिखते है इरादों को
"समीर " उनके मुकद्दर के सफे कोरे नहीं होते !
सोमवार, 28 सितंबर 2009
दरोगा साहब की कारस्तानी तो देखिये
फैजाबाद पुलिस की सजगता को प्रदर्शित करती एक खबर २८ सितम्बर को उपरोक्त शीर्षक से छपी जिसे पढ़कर बड़ी कोफ्त हुई की आखिर उस देश का क्या होगा जिसके रक्षक प्रहरी इतने लापरवाह होगे ..की उनके तकिये के नीचे से चोर उनकी सर्विस रिवाल्वर व तीन मोबाइल भी उठा ले गए .इन सारे सामानों के गायब होने की खबर अमृत लाल नामक दरोगा को सुबह पता चली आनन फानन में खबर जंगल में आग के तरह फैली पुलिस महकमे के आला अधिकारी एस एस पी ने जाँच सीओ स्तर के अधिकारी को दे दिया इतना ही नहीं दरोगा ने अज्ञात लोगो के खिलाफ थाना पुराकलंदर में अपराध नम्बर ८३७ /०९ धारा ३८० के तहत मामला भी दर्ज करा दिया ..यह तो रही घटना ...अब इस घटना की जानकारी होने के बाद आम जनता इन निकम्मे पुलिस वालो पर कैसे भरोषा करे नये पुलिस महानिदेशक कर्मबीर सिंह जी अपने इन लापरवाह पुलिस वालो को कैसे सुधारेगे..अरे कुछ करिए साहब ....
फैजाबाद पुलिस की सजगता को प्रदर्शित करती एक खबर २८ सितम्बर को उपरोक्त शीर्षक से छपी जिसे पढ़कर बड़ी कोफ्त हुई की आखिर उस देश का क्या होगा जिसके रक्षक प्रहरी इतने लापरवाह होगे ..की उनके तकिये के नीचे से चोर उनकी सर्विस रिवाल्वर व तीन मोबाइल भी उठा ले गए .इन सारे सामानों के गायब होने की खबर अमृत लाल नामक दरोगा को सुबह पता चली आनन फानन में खबर जंगल में आग के तरह फैली पुलिस महकमे के आला अधिकारी एस एस पी ने जाँच सीओ स्तर के अधिकारी को दे दिया इतना ही नहीं दरोगा ने अज्ञात लोगो के खिलाफ थाना पुराकलंदर में अपराध नम्बर ८३७ /०९ धारा ३८० के तहत मामला भी दर्ज करा दिया ..यह तो रही घटना ...अब इस घटना की जानकारी होने के बाद आम जनता इन निकम्मे पुलिस वालो पर कैसे भरोषा करे नये पुलिस महानिदेशक कर्मबीर सिंह जी अपने इन लापरवाह पुलिस वालो को कैसे सुधारेगे..अरे कुछ करिए साहब ....
मंगलवार, 22 सितंबर 2009
अपने दिल को पत्थर का बना कर रखना,
हर चोट के निशान को सजा कर रखना
उड़ना हवा में खुल कर लेकिन,
अपने कदमों को ज़मी से मिला कर रखना
छाव में माना सुकून मिलता है बहुत,
फिर भी धूप में खुद को जला कर रखना
उम्रभर साथ तो रिश्ते नहीं रहते हैं,
यादों में हर किसी को जिन्दा रखना
वक्त के साथ चलते-चलते , खो ना जाना,
खुद को दुनिया से छिपा कर रखना
रातभर जाग कर रोना चाहो जो कभी,
अपने चेहरे को दोस्तों से छिपा कर रखना
तुफानो को कब तक रोक सकोगे तुम,
कश्ती और मांझी का याद पता रखना
हर कहीं जिन्दगी एक सी ही होती हैं,
अपने ज़ख्मों को अपनो को बता कर रखना
मन्दिरो में ही मिलते हो भगवान जरुरी नहीं,
हर किसी से रिश्ता बना कर रखना
मरना जीना बस में कहाँ है अपने,
हर पल में जिन्दगी का लुफ्त उठाये रखना
दर्द कभी आखरी नहीं होता,
अपनी आँखों में अश्को को बचा कर रखना
सूरज तो रोज ही आता है मगर,
अपने दिलो में ' दीप ' को जला
हर चोट के निशान को सजा कर रखना
उड़ना हवा में खुल कर लेकिन,
अपने कदमों को ज़मी से मिला कर रखना
छाव में माना सुकून मिलता है बहुत,
फिर भी धूप में खुद को जला कर रखना
उम्रभर साथ तो रिश्ते नहीं रहते हैं,
यादों में हर किसी को जिन्दा रखना
वक्त के साथ चलते-चलते , खो ना जाना,
खुद को दुनिया से छिपा कर रखना
रातभर जाग कर रोना चाहो जो कभी,
अपने चेहरे को दोस्तों से छिपा कर रखना
तुफानो को कब तक रोक सकोगे तुम,
कश्ती और मांझी का याद पता रखना
हर कहीं जिन्दगी एक सी ही होती हैं,
अपने ज़ख्मों को अपनो को बता कर रखना
मन्दिरो में ही मिलते हो भगवान जरुरी नहीं,
हर किसी से रिश्ता बना कर रखना
मरना जीना बस में कहाँ है अपने,
हर पल में जिन्दगी का लुफ्त उठाये रखना
दर्द कभी आखरी नहीं होता,
अपनी आँखों में अश्को को बचा कर रखना
सूरज तो रोज ही आता है मगर,
अपने दिलो में ' दीप ' को जला
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