बाल ठाकरे के बारे में ऐसा कुछ नया नहीं हैं जो कहा जा सके। लेकिन पुराना इतना है और उसे वे फिर से घृणा का हिमालय बना देने पर तुले हुए हैं कि अगर इतने बुजुर्ग नहीं होते तो कनपटी के नीचे मारने का मन करता है। टपोरी भाषा बोलते हैं, मवालियों की तरह धमकी देते और दिलवाते है और ऐलानिया कहते है कि मुंबई सिर्फ मराठियों की है और यहां वही होगा जो शिवसेना चाहेगी।
आपको याद दिलाने की जरूरत नहीं कि दाऊद इब्राहीम के समधी जावेद मियादाद से ठाकरे की कितनी अंतरंगता रही है। इसके तो पोस्टर छप चुके है। बेचारे उध्दव ठाकरे जिन्हें ठीक से बोलना भी नहीं आता, कहते हैं कि जावेद मियादाद भारत में पाकिस्तान को खेलने देने की अनुमति मांगने आए थे। यह किसी को पता नहीं कि ठाकरे भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के मुखिया कब बने थे जो पाकिस्तान के कप्तान को उनसे खेलने की अनुमति मांगनी पड़े?
विचित्र यह लगता है कि बाल ठाकरे पढ़े लिखे आदमी है। फ्री प्रेस जनरल में अंग्रेजी के कार्टूनिस्ट हुआ करते थे और देश के सबसे बड़े कार्टूनिस्ट आर के लक्ष्मण के दोस्त है। लक्ष्मण तमिलनाडु के हैं और ठाकरे को शिवसेना अध्यक्ष के अवतार में तमिल लोग भी पसंद नहीं है। उन्हें अंडरवर्ल्ड सरगना छोटा राजन और अरुण गवली से सहानुभूति हैं क्योंकि ये दोनों मराठी माणुष है। दाऊद और अबू सालेम उनके लिए खलनायक है। जैसे दाऊद की डी कंपनी चलती है वैसे ही मुंबई में ठाकरे की 'टी' कंपनी चल रही है।
डी कंपनी भी बॉलीवुड पर धौंस जमा कर वसूली करती है और टी कंपनी भी कुल मिला कर बॉलीवुड को काबू में रखना चाहती है। अब शाहरूख खान का क्या कहा जाए। उन्हें तो पता ही नहीं होता कि वे कब क्या बोल रहे है। आईपीएल में खुद उन्होंने पाकिस्तानी खिलाड़ियों को हाथ नहीं लगाया और फिर इस सामूहिक और सोचे समझे बहिष्कार को मजहब का नाम दे कर कहा कि गलत हुआ है। फिर सचिन तेदुंलकर की तर्ज पर कहा कि पाकिस्तान और भारत के साथ खेल के रिश्ते कायम रहने चाहिए।
ठाकरे गिरोह ने शाहरूख से कहा कि माफी मांगो। शाहरूख अमेरिका में अपनी फिल्म माइ नेम इज खान का प्रचार करने गए थे। वहीं से बोले कि मैं माफी नहीं मागूंगा। ठाकरे का एक चमचा और सामना नाम के पर्चे का संपादक बोला कि अमेरिका में बैठ कर बोलना आसान है लेकिन शाहरूख खान को याद रखना चाहिए कि वे मुंबई में रहते हैं और उनका परिवार भी है। लौट कर आएं तो निपट लिया जाएगा। यह जान से मारने की खुली धमकी है और भारतीय दंड विधान की धारा 506 के तहत गैर जमानती अपराध है। मगर ठाकरे के संपादक को चव्हाण की पुलिस भी हाथ नहीं लगाती।
दूसरी तरफ अपने बिग बी हैं जो इन दिनों नरेंद्र मोदी के भक्त के अवतार में हैं और गुजरात सरकार के ब्रांड एंबेसडर खुद प्रस्ताव कर के बने है। बिग बी यानी अमिताभ बच्चन ने अनिल अंबानी की कंपनी द्वारा चलाए जा रहे ब्लॉग बिग अड्डा पर दूसरे बिग बी यानी बाल ठाकरे का जो स्तुतिगान किया है उससे अपने जैसे प्रचंड अमिताभ प्रशंसकों को भी शर्म आने लगी है। अमिताभ बच्चन को बाल ठाकरे की वाणी में अंगारे दिखते हैं, आत्मा में ज्वाला दिखती हैं और मन में देशभक्ति नजर आती है। अमिताभ बच्चन कुल मिला कर बार बार अपने कायर होने का परिचय देते रहे है। एक बार जया बच्चन ने जब हिंदी में बोलने पर ठाकरे के घर जा कर माफी मांगी थी तब भी बहुत अटपटा लगा था। खास तौर पर इसलिए कि अपन बचपन से जया बच्चन रहे हैं और जब चौदह साल के थे तो गुड्डी फिल्म देख कर उनसे शादी का इरादा बना लिया था और बाकायदा बांग्ला सीखनी शुरू कर दी थी।
मगर बाल ठाकरे मुंबई पर मराठियों और सिर्फ मराठियों का अधिकार चाहते हैं तो यह सोचने वाली बात है। आपने गौर किया होगा कि शिव सैनिक जब सड़कों पर तांडव मचाने निकलते हैं तो पूरा ठाकरे कुटुंब अपने घरों में कैद रहता है। उनकी सड़कों पर निकलने की हिम्मत नहीं होती। नाम शिवाजी का लेते हैं मगर काम औरंगजेब वाला करते है। और अगर कहीं हिंदी भाषी प्रतिशोध और प्रतिकार की मुद्रा में आ गए तो शिव सैनिकों को मुंह छिपाने की जगह नहीं मिलेगी। मुंबई में करीब चालीस लाख हिंदी भाषी हैं जो सहिष्णु भी हैं और अपने काम से काम रखते है। हर मराठी शिव सैनिक नहीं है। इसलिए हिंदी भाषियों का स्वाभिमान अगर प्रतिकार में बदल गया तो ठाकरे बहुत ठुकेंगे।
गौर करने की बात यह भी है कि ठाकरे के तथाकथित मराठी अस्मिता के मुद्दे को किसी और दल या संगठन ने नहीं अपनाया। दिल्ली में भी कुछ नहीं तो चार पांच लाख मराठी तो रहते ही हैं और उन्हें हिंदी से कोई तकलीफ नहीं है। ग्वालियर और इंदौर जैसे शहरों में चूंकि एक समय मराठियाें का राज था इसलिए अच्छी खासी मराठी जनसंख्या इन दोनों शहरों में हैं और वहां मराठी और हिंदी का झगड़ा कभी नहीं हुआ। ठाकरे नाम के एक गुंडे ने भारत की माया नगरी को देश का यातना शिविर बना दिया है।
ठाकरे की उम्र हो चली है और जिस उम्र में लोगाें को सम्मान मिलना चाहिए उसमें ठाकरे देश भर के खलनायक बन गए। बेटे उध्दव को भी उन्हो।ने घृणा की शिक्षा दी है और उध्दव की तोतली जुबान में बाल ठाकरे जैसी उग्रता नहीं है। राज ठाकरे ने बाल ठाकरे का उत्तराधिकार बाकायदा छीना है। जब बाल ठाकरे मुंबई में नफरत की आंधी चलवाते हैं तो एक तरह से वे राज ठाकरे से हिसाब बराबर भी कर रहे होते है।
ठाकरे की तथाकथित मराठी अस्मिता के मुद्दे को और किसी को दल या संगठन ने नहीं अपनाया। यहां तक कि संघ परिवार के स्वयं सेवकाें को भी फरमान मिल गया है कि वे उत्तर भारतीयों की रक्षा करे। जाहिर है कि संघ परिवार का आधार मूल रूप से उत्तर भारत में हैं और भाजपा की आधार भूमि भी वहीं है। संघ के स्वयं सेवकों को शाखा में सबसे पहले लाठी चलाना सिखाया जाता है और संघ मुख्यालय में मोहन भागवत से ले कर राम माधव तक जितने मराठी है उतने शिवसेना मुख्यालय में नहीं होंगे। इसलिए बाल ठाकरे को अपनी विनम्र सलाह है कि वे अपना बुढ़ापा खराब नहीं करे। फिर भी अगर निपटना चाहते हैं तो अपनी गली से बाहर निकले और एंबुलेंस साथ में ले कर आए। देश की बहुत बड़ी जनसंख्या उन्हें कंबल में लपेट कर उनका जूता सत्कार करने का इंतजार कर रही है। वैसे बाल ठाकरे को अगर अपनी वंशावली याद हो तो उनके पुरखें मध्य प्रदेश के खंडवा से मुंबई आ कर बसे थे। ये वही खंडवा है जहां से किशोर कुमार और अशोक कुमार मुंबई आए थे। इतने सुरीले खंडवा का नाम भी ठाकरे बदनाम कर रहे है। उन पर पुरखों की जमीन को लांछित करने का अपराध भी साबित होता है।
रविवार, 7 फ़रवरी 2010
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